सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

बातें की हैं

अपने बिसरे हुए किरदार से बातें की हैं
मुद्दतों बाद किसी यार से बातें की हैं

जिंदगी, देखिये अब किस गली में मुड़ती है
रात भर उसने बड़े प्यार से बातें की हैं

उसने बोला है, कोई ख़्वाब नहीं मारेगी
मैंने खुद वक़्त की तलवार से बातें की हैं

तभी से काट रहा हूँ चिकोटियाँ खुद को
जब से कल अपने तलबगार से बातें की हैं

आज भी घर तेरी ख़ुश्बू को याद करता है
मैंने जब तब दरो दीवार से बातें की हैं

हाय वो शख़्स भी दिल की जुबान रखता है
जिसने हरदम महज़ अधिकार से बातें की हैं

आप आनंद की बातों पे यकीं करना तो
ये न कहना किसी मयख्वार से बातें की हैं

© आनंद

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

तड़प उठता हूँ

एक भी शेर सुनाने से तड़प उठता हूँ
अब ये सौगात लुटाने से तड़प उठता हूँ

मेरा हर ज़ख्म किसी यार की निशानी है
एक भी दाग़ मिटाने से तड़प उठता हूँ

तुम किसी चोट पे मरहम लगा के हटती हो
मैं किसी और बहाने से तड़प उठता हूँ

उम्र जिस ख़्वाब की ताबीर बनाते गुजरी
मैं वही ख़्वाब मिटाने से तड़प उठता हूँ

लोग यादों में तड़पते हुए मिल जाते हैं
और मैं याद न आने से तड़प उठता हूँ

एक 'आनंद' ही ले दे के बचा रक्खा था
अब वही दाँव लगाने से तड़प उठता हूँ

© आनंद

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

उसी किरदार में अटका हुआ हूँ

दरो दीवार में अटका हुआ हूँ
अभी संसार में अटका हुआ हूँ

किसी ग़ुल ने लुटा दी जिंदगानी
मैं अब तक ख़ार में अटका हुआ हूँ

वो मेरी रूह से सटकर खड़ी है
मैं बस सिंगार में अटका हुआ हूँ

किसी का हाथ अब तक हाथ में है
इसी त्योहार में अटका हुआ हूँ

यहाँ है डूबना ही पार जाना
मगर मँझधार में अटका हुआ हूँ

अधूरी ख्वाहिशों का पीर हूँ मैं
ग़म-ओ-आज़ार में अटका हुआ हूँ

वो करके क़त्ल फिर से म्यान में है
मैं जिसकी धार में अटका हुआ हूँ

मुसलसल फ़क्कड़ी है इश्क़ यारों
मैं लोकाचार में अटका हुआ हूँ

अभी 'आनंद' से मिलना हुआ है
उसी किरदार में अटका हुआ हूँ

© आनंद

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

होता जा रहा हूँ...

धुन-ए-रुबाब होता जा रहा हूँ
बड़ा नायाब होता जा रहा हूँ

धड़कता हूँ किसी की धडकनों में
किसी का ख़्वाब होता जा रहा हूँ

फितरतन हूँ नहीं बेसब्र फिर भी
इधर बेताब होता जा रहा हूँ

तुम्हारे इश्क़ ने जब से छुआ है
मैं चश्म-ए-आब होता जा रहा हूँ

हुज़ूर-ए-अंजुमन में आ गया हूँ
पर-ए-सुर्खाब होता जा रहा हूँ

न यूँ हसरत से ताको आसमाँ को
मैं माहेताब होता जा रहा हूँ

वो इतनी नाज़ुकी से मिल रहे हैं
मैं खुद आदाब होता जा रहा हूँ

तिरे 'आनंद' की इक बूँद भर हूँ
जो अब सैलाब होता जा रहा हूँ

© आनंद

बुधवार, 27 सितंबर 2017

प्रेम के रंग

सबसे खूबसूरत होता है ये संसार
जब डूबा होता है प्रेम के रंगों में
उदात्त और उत्कृष्ट होता जाता है ,
हर रंग कुछ और निखरता जाता है
जब घुलता है नेह के साथ समर्पण भी.

अधिकार सबसे बड़ा शत्रु है
जो न जाने कब
संवेदनाओं में छुपकर सेंध लगा लेता
दिल की दुनिया में.

अधिकार से उपजी अपेक्षाएँ
अपेक्षाओं से जन्मी नादानियों में
माफ नहीं किये जाते प्रेमी
न ही खुद के और न ही प्रेम के द्वारा

सायास चुप्पियां,
बेवजह की व्यस्तता,
नपा-तुला जवाब..कितना कुछ होता है ऐसा
जो बता देता है कि सफल हुआ शत्रु का वार
प्रेम पर विजयी हुआ अधिकार

नियत है फिर छटपटाहट
ये सजा भी है और सीख भी
कि प्रेम में उतार वाली सीढ़ियों पर
बढ़ाया गया कदम होती है अपेक्षाएँ

सुनो भोलेराम !
प्रेम में लापरवाही से मत चलाना
रंग भरी एक भी कूची
समर्पण को ही रखना सर्वोच्च
भावों के पुष्प चुनने में रखना खास ख़्याल
कि उनके रंग और महक़ से प्रीतम को होती रहे
साफ, ताजी और खुली हवा का अहसास !

© आनंद