सोमवार, 6 नवंबर 2017

ये समझिये

हजारों रंग की मेरी कहानी, ये समझिये
पलों में ख़ार पल में गुल्फ़िशानी ये समझिये

शरारत ये बड़ी मासूम की है ख़ुशबुओं ने
रग़ों में बह चली है रातरानी ये समझिये

पड़ेगा वक़्त तो ये रतजगे सच बोल देंगे
हुए हैं ख़्वाब कैसे जाफ़रानी ये समझिये

बहारें भी यहाँ महफूज़ रहना जानती हैं
हुए हैं रंग सारे हुक्मरानी ये समझिये

जहाँ बच्चे लगाकर मास्क साँसे ले रहे हैं
हमारे देश की है राजधानी ये समझिये

अभी मैं डर रहा हूँ हर कदम राहों में तेरी
अभी सब याद हैं बातें पुरानी ये समझिये

कभी दो चार दिन आनंद के भी संग रहिये
कठिन संग्राम सी है जिंदगानी ये समझिये

© आनंद

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

इश्क़ की राह

मेरी ज़िद
तुम्हारे झुमके में फँसा
चुनरी का वो हिस्सा है
जिसे तुम बड़े एहतियात से छुड़ाती हो,
उस घड़ी
खीझ और धैर्य का 'प्रयाग' होता है
तुम्हारा चेहरा

तुम्हारा उलाहना
मेरी कलम का खो गया वो कैप है
जिसके बिना
खतरे में है उसका अस्तित्व
कितना भी अच्छा लिखने के बावजूद,
उस घड़ी
इश्क़ की इबारत होता है
तुम्हारा उलाहना

मेरी जिद और तुम्हारे उलाहने
दोनों से
दो कोस और रह जाता है इश्क़
जब कभी खुले बाल लेकर तुम तय करती हो
ये दो कोस की दूरी
चंपा के फूल सी महक़ उठती हैं
इश्क़ की गलियाँ !
और दुआओं सा झरता है प्यार
हमारे जीवन की देहरी पर !!

ऐ सुनो न..
क्या मैं भी इस जनम में
ये दो कोस चल पाउँगा कभी ?

© आनंद

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

बातें की हैं

अपने बिसरे हुए किरदार से बातें की हैं
मुद्दतों बाद किसी यार से बातें की हैं

जिंदगी, देखिये अब किस गली में मुड़ती है
रात भर उसने बड़े प्यार से बातें की हैं

उसने बोला है, कोई ख़्वाब नहीं मारेगी
मैंने खुद वक़्त की तलवार से बातें की हैं

तभी से काट रहा हूँ चिकोटियाँ खुद को
जब से कल अपने तलबगार से बातें की हैं

आज भी घर तेरी ख़ुश्बू को याद करता है
मैंने जब तब दरो दीवार से बातें की हैं

हाय वो शख़्स भी दिल की जुबान रखता है
जिसने हरदम महज़ अधिकार से बातें की हैं

आप आनंद की बातों पे यकीं करना तो
ये न कहना किसी मयख्वार से बातें की हैं

© आनंद

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

तड़प उठता हूँ

एक भी शेर सुनाने से तड़प उठता हूँ
अब ये सौगात लुटाने से तड़प उठता हूँ

मेरा हर ज़ख्म किसी यार की निशानी है
एक भी दाग़ मिटाने से तड़प उठता हूँ

तुम किसी चोट पे मरहम लगा के हटती हो
मैं किसी और बहाने से तड़प उठता हूँ

उम्र जिस ख़्वाब की ताबीर बनाते गुजरी
मैं वही ख़्वाब मिटाने से तड़प उठता हूँ

लोग यादों में तड़पते हुए मिल जाते हैं
और मैं याद न आने से तड़प उठता हूँ

एक 'आनंद' ही ले दे के बचा रक्खा था
अब वही दाँव लगाने से तड़प उठता हूँ

© आनंद

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

उसी किरदार में अटका हुआ हूँ

दरो दीवार में अटका हुआ हूँ
अभी संसार में अटका हुआ हूँ

किसी ग़ुल ने लुटा दी जिंदगानी
मैं अब तक ख़ार में अटका हुआ हूँ

वो मेरी रूह से सटकर खड़ी है
मैं बस सिंगार में अटका हुआ हूँ

किसी का हाथ अब तक हाथ में है
इसी त्योहार में अटका हुआ हूँ

यहाँ है डूबना ही पार जाना
मगर मँझधार में अटका हुआ हूँ

अधूरी ख्वाहिशों का पीर हूँ मैं
ग़म-ओ-आज़ार में अटका हुआ हूँ

वो करके क़त्ल फिर से म्यान में है
मैं जिसकी धार में अटका हुआ हूँ

मुसलसल फ़क्कड़ी है इश्क़ यारों
मैं लोकाचार में अटका हुआ हूँ

अभी 'आनंद' से मिलना हुआ है
उसी किरदार में अटका हुआ हूँ

© आनंद